आनुवंशिकता वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा माता-पिता (जनकों) से संतति में लक्षणों (Traits) का स्थानांतरण होता है। इसी कारण मनुष्य का बच्चा मनुष्य जैसा तथा कुत्ते का बच्चा कुत्ते जैसा दिखता है। लक्षणों का यह स्थानांतरण डीएनए (DNA) नामक रासायनिक पदार्थ के माध्यम से होता है, जो जनन कोशिकाओं में उपस्थित रहता है। दूसरी ओर विभिन्नता एक ही प्रजाति के विभिन्न जीवों के लक्षणों में पाए जाने वाले अंतर को कहते हैं, जैसे आँखों का रंग, बालों का सीधा या घुंघराला होना। अलैंगिक जनन में विभिन्नताएँ बहुत कम होती हैं, जबकि लैंगिक जनन में दो जनकों के डीएनए के मिलने से विभिन्नताएँ अधिक होती हैं, जो जैव विकास (Evolution) का आधार बनती हैं।
जैव विकास सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों (विभिन्नताओं) के द्वारा समय के साथ जटिल जीवों के निर्माण की प्रक्रिया है। विकास की व्याख्या चार्ल्स डार्विन के प्राकृतिक चयन के सिद्धांत द्वारा की जाती है। इस अध्याय में हम आनुवंशिकता एवं विभिन्नता, ग्रेगर जॉन मेंडल के मटर पर किए गए प्रयोग (एकल संकरण एवं द्विसंकरण क्रॉस), लिंग निर्धारण, डार्विन का विकास सिद्धांत, उपार्जित एवं आनुवंशिक लक्षण, जाति उद्भवन तथा विकास के प्रमाण (समजात अंग, समरूप अंग, जीवाश्म) का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
ग्रेगर जॉन मेंडल को आनुवंशिकी का जनक (Father of Genetics) कहा जाता है। उन्होंने मटर के पौधे (Pisum sativum) पर संकरण के प्रयोग करके वंशागति के नियम दिए। मटर का पौधा चुनने के कारण हैं - इसका जीवन चक्र छोटा होता है, इसमें आसानी से पहचाने जाने वाले विपर्यासी लक्षण होते हैं (लंबा/बौना, गोल/झुर्रीदार बीज, सफेद/बैंगनी फूल), तथा यह स्व-परागित होता है, परंतु कृत्रिम रूप से पर-परागण भी कराया जा सकता है।
जब एक ही लक्षण के दो विपर्यासी रूपों का अध्ययन किया जाता है तो उसे एकल संकरण क्रॉस कहते हैं। मेंडल ने एक शुद्ध लंबे (TT) तथा एक शुद्ध बौने (tt) पौधे का संकरण कराया। F1 पीढ़ी में सभी पौधे लंबे (Tt) हुए, कोई भी बौना नहीं। F1 के लंबे (Tt) पौधों का स्व-परागण कराने पर F2 पीढ़ी में लंबे तथा बौने दोनों पौधे प्राप्त हुए। जीनोटाइप अनुपात 1 (TT) : 2 (Tt) : 1 (tt) तथा फीनोटाइप अनुपात 3 (लंबे) : 1 (बौना) था।
जब दो अलग-अलग लक्षणों (जैसे बीज का आकार तथा रंग) का एक साथ अध्ययन किया जाता है तो उसे द्विसंकरण क्रॉस कहते हैं। गोल एवं पीले बीज वाले पौधे (RRYY) का संकरण झुर्रीदार एवं हरे बीज वाले पौधे (rryy) से कराने पर F1 पीढ़ी में सभी पौधे गोल एवं पीले (RrYy) बीज वाले थे। F2 पीढ़ी में अनुपात 9 (गोल-पीले) : 3 (गोल-हरे) : 3 (झुर्रीदार-पीले) : 1 (झुर्रीदार-हरे) प्राप्त हुआ। इससे स्वतंत्र अपव्यूहन का नियम सिद्ध हुआ, जिसके अनुसार लक्षण एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से अगली पीढ़ी में जाते हैं।
नवजात शिशु का लिंग गुणसूत्रों द्वारा निर्धारित होता है। मानव की प्रत्येक कोशिका में 23 जोड़े (46) गुणसूत्र होते हैं। इनमें से 22 जोड़े नर तथा मादा में समान होते हैं, जिन्हें अलिंगसूत्र (Autosomes) कहते हैं। 23वाँ जोड़ा लिंग गुणसूत्र कहलाता है। महिलाओं में यह XX तथा पुरुषों में XY होता है।
माता (XX) सदैव X गुणसूत्र वाला अंडाणु उत्पन्न करती है, जबकि पिता (XY) दो प्रकार के शुक्राणु बनाता है - X तथा Y। यदि पिता का X शुक्राणु माता के X अंडाणु से मिलता है तो संतति XX (लड़की) होती है; यदि पिता का Y शुक्राणु माता के X अंडाणु से मिलता है तो संतति XY (लड़का) होती है। अतः बच्चे का लिंग पूरी तरह से पिता के शुक्राणु पर निर्भर करता है।
जैव विकास सरल जीवों से क्रमिक परिवर्तनों के द्वारा जटिल जीवों के निर्माण की प्रक्रिया है। चार्ल्स डार्विन ने अपनी पुस्तक द ओरिजिन ऑफ स्पीशीज़ में प्राकृतिक चयन का सिद्धांत प्रस्तुत किया। इसके अनुसार, प्रकृति उन जीवों का चयन करती है जिनके पास बदलते पर्यावरण में जीवित रहने के लिए सर्वोत्तम अनुकूलन (Adaptations) तथा विभिन्नताएँ होती हैं। जो जीव स्वयं को नहीं बदल पाते वे नष्ट हो जाते हैं, जैसे डायनासोर। इसे योग्यतम की उत्तरजीविता (Survival of the Fittest) कहते हैं।
उपार्जित लक्षण: ये लक्षण जीव अपने जीवनकाल में पर्यावरण के प्रभाव या अभ्यास से प्राप्त करता है। ये डीएनए (जनन कोशिकाओं) में कोई परिवर्तन नहीं करते, इसलिए अगली पीढ़ी में नहीं जाते। उदाहरण - तैरना सीखना, साइकिल चलाना, दुर्घटना में पूँछ का कट जाना।
आनुवंशिक लक्षण: ये लक्षण माता-पिता से डीएनए के माध्यम से प्राप्त होते हैं। ये जनन कोशिकाओं में उपस्थित होते हैं, इसलिए अगली पीढ़ी में स्थानांतरित होते हैं। उदाहरण - आँखों का रंग, बालों का प्रकार, त्वचा का रंग।
एक पुरानी प्रजाति से एक नई प्रजाति के बनने की प्रक्रिया को जाति उद्भवन कहते हैं। यह तब होता है जब एक ही प्रजाति की आबादी किसी भौगोलिक कारण (नदी, पहाड़) से दो हिस्सों में बँट जाती है (भौगोलिक पृथक्करण)। धीरे-धीरे दोनों हिस्सों के जीवों में अलग-अलग विभिन्नताएँ आती हैं। हजारों वर्षों के बाद उनका डीएनए इतना बदल जाता है कि वे आपस में जनन नहीं कर सकते, तब वे दो अलग प्रजातियाँ बन जाती हैं।
वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना तथा उत्पत्ति समान होती है परंतु कार्य अलग-अलग होते हैं, समजात अंग कहलाते हैं। पक्षी का पंख, मनुष्य का हाथ, घोड़े का अग्रपाद तथा मेंढक का अग्रपाद - इन सबकी हड्डियों का ढाँचा एक जैसा है, परंतु कार्य भिन्न हैं। यह दर्शाता है कि इनका पूर्वज एक ही था।
वे अंग जिनकी मूलभूत संरचना भिन्न होती है परंतु कार्य समान होता है, समरूप अंग कहलाते हैं। पक्षी के पंख तथा तितली के पंख दोनों उड़ने का कार्य करते हैं, परंतु तितली के पंख में हड्डियाँ नहीं होतीं। यह दर्शाता है कि समान पर्यावरण में रहने के कारण उनमें समान अनुकूलन आया, परंतु उनके पूर्वज अलग थे।
अतीत में रहने वाले मृत जीवों के कठोर अंगों (हड्डियाँ, दाँत, खोपड़ी) के चट्टानों में दबे अवशेष या उनके छाप जीवाश्म कहलाते हैं। जीवाश्मों से विलुप्त जीवों (जैसे डायनासोर) के बारे में जानकारी मिलती है। जीवाश्म की आयु खुदाई विधि (सतह के पास के जीवाश्म नए होते हैं) तथा रेडियो-कार्बन डेटिंग (कार्बन-14 के क्षय द्वारा) से ज्ञात की जाती है। आर्किओप्टेरिक्स जीवाश्म में सरीसृप तथा पक्षियों दोनों के लक्षण मिलते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि पक्षियों का विकास सरीसृपों से हुआ है।
| क्रॉस | लक्षण | F1 पीढ़ी | F2 अनुपात |
|---|---|---|---|
| एकल संकरण | पौधे की ऊँचाई | सभी लंबे (Tt) | 3:1 (लंबे:बौने) |
| द्विसंकरण | बीज आकार + रंग | सभी गोल-पीले (RrYy) | 9:3:3:1 |
| लक्षण | उपार्जित | आनुवंशिक |
|---|---|---|
| प्राप्ति का स्रोत | पर्यावरण/अभ्यास | माता-पिता (डीएनए) |
| डीएनए में परिवर्तन | नहीं | हाँ |
| अगली पीढ़ी में जाना | नहीं | हाँ |
| उदाहरण | साइकिल चलाना | आँखों का रंग |
| प्रमाण | संरचना | कार्य | उदाहरण |
|---|---|---|---|
| समजात अंग | समान | भिन्न | पंख, हाथ, अग्रपाद |
| समरूप अंग | भिन्न | समान | पक्षी पंख, तितली पंख |
| जीवाश्म | अवशेष | इतिहास | आर्किओप्टेरिक्स |
आनुवंशिकता एवं जैव विकास जीव विज्ञान की दो परस्पर संबंधित अवधारणाएँ हैं। आनुवंशिकता लक्षणों का जनकों से संतति में स्थानांतरण है, जो डीएनए द्वारा होता है। विभिन्नताएँ विकास का आधार हैं, जो अलैंगिक जनन में कम तथा लैंगिक जनन में अधिक होती हैं। मेंडल के मटर पर किए गए प्रयोगों ने वंशागति के नियम स्थापित किए, जिनमें F2 अनुपात 3:1 तथा 9:3:3:1 महत्वपूर्ण हैं। लिंग निर्धारण पिता के X या Y शुक्राणु पर निर्भर करता है। डार्विन के प्राकृतिक चयन सिद्धांत के अनुसार योग्यतम की उत्तरजीविता ही विकास की प्रक्रिया है। समजात अंग, समरूप अंग तथा जीवाश्म विकास के प्रमाण हैं। आनुवंशिकी का ज्ञान कृषि, चिकित्सा तथा जैव तकनीकी के क्षेत्रों में अत्यंत उपयोगी है।