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1. परिचय

सभी जीवित जीवों को जीवित रहने के लिए निरंतर अपने शरीर के अनुरक्षण (maintenance) की आवश्यकता होती है। वे सभी प्रक्रम जो सम्मिलित रूप से जीवों के अनुरक्षण का कार्य करते हैं, जैव प्रक्रम कहलाते हैं। पोषण, श्वसन, वहन तथा उत्सर्जन ये चार मुख्य जैव प्रक्रम हैं, जिनके बिना जीवन संभव नहीं है। भोजन ग्रहण करना पोषण है, भोजन से ऊर्जा प्राप्त करना श्वसन है, शरीर में पदार्थों का एक स्थान से दूसरे स्थान तक परिवहन वहन है तथा हानिकारक अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालना उत्सर्जन है। ये प्रक्रम एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

जीवों की आवश्यकताओं और संरचना के अनुसार ये प्रक्रम विभिन्न जीवों में भिन्न-भिन्न प्रकार से संपन्न होते हैं। पौधों में पोषण प्रकाश-संश्लेषण द्वारा होता है, जबकि मनुष्य में पाचन तंत्र द्वारा भोजन का पाचन होता है। श्वसन कोशिका के अन्दर होने वाली प्रक्रिया है जिसमें ग्लूकोज के विखंडन से ऊर्जा (ATP) प्राप्त होती है। इस अध्याय में हम पोषण, श्वसन, वहन तथा उत्सर्जन नामक चारों जैव प्रक्रमों का मानव तथा पादपों के संदर्भ में विस्तृत अध्ययन करेंगे, ताकि जीवन के मूलभूत सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से समझा जा सके।

2. पोषण

सजीवों द्वारा भोजन ग्रहण करने तथा उसका उपयोग ऊर्जा प्राप्त करने और शरीर की वृद्धि के लिए करने की प्रक्रिया पोषण कहलाती है। पोषण दो प्रकार का होता है - स्वपोषी पोषण तथा विषमपोषी पोषण।

(क) स्वपोषी पोषण

जब जीव अपना भोजन स्वयं बनाते हैं तो इसे स्वपोषी पोषण कहते हैं। हरे पौधे तथा कुछ जीवाणु स्वपोषी होते हैं। हरे पौधे सूर्य के प्रकाश तथा क्लोरोफिल की उपस्थिति में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) और जल (H₂O) का उपयोग करके ग्लूकोज बनाते हैं। इस प्रक्रिया को प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं।

$6CO_2 + 12H_2O \xrightarrow{\text{सूर्य का प्रकाश / क्लोरोफिल}} C_6H_{12}O_6 + 6O_2 + 6H_2O$

प्रकाश-संश्लेषण की मुख्य घटनाएँ हैं - क्लोरोफिल द्वारा प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण, प्रकाश ऊर्जा का रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन तथा जल के अणुओं का हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में टूटना, और CO₂ का ग्लूकोज में अपचयन। पत्तियों की सतह पर उपस्थित रंध्र (Stomata) सूक्ष्म छिद्र हैं जिनके द्वारा गैसों का आदान-प्रदान तथा वाष्पोत्सर्जन होता है।

(ख) विषमपोषी पोषण

जब जीव अपने भोजन के लिए प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दूसरे जीवों पर निर्भर रहते हैं तो इसे विषमपोषी पोषण कहते हैं। जंतु, मनुष्य तथा कवक विषमपोषी हैं।

मानव में पोषण: मानव का पाचन तंत्र मुँह से गुदा तक फैली लंबी नली है, जिसे आहारनाल कहते हैं। मुँह में दाँत भोजन को चबाते हैं तथा लार ग्रंथि से निकला एमाइलेज एंजाइम स्टार्च को शर्करा में बदलता है। भोजन क्रमांकुंचन गति द्वारा ग्रसिका से होकर आमाशय पहुँचता है। आमाशय में जठर ग्रंथियाँ HCl, पेप्सिन तथा श्लेष्मा स्रावित करती हैं; HCl अम्लीय माध्यम बनाता है और श्लेष्मा आमाशय की दीवार की रक्षा करती है। क्षुद्रांत्र में कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन तथा वसा का पूर्ण पाचन होता है। यकृत पित्त रस स्रावित करता है जो वसा का इमल्सीकरण करता है, तथा अग्न्याशय ट्रिप्सिन और लाइपेज एंजाइम स्रावित करता है। पचे हुए भोजन का अवशोषण क्षुद्रांत्र की भित्ति में उपस्थित दीर्घरोम (Villi) द्वारा होता है। बृहदांत्र में जल का अवशोषण होता है तथा शेष अपशिष्ट गुदा द्वारा बाहर निकल जाता है।

3. श्वसन

कोशिकाओं में ऑक्सीजन की उपस्थिति या अनुपस्थिति में ग्लूकोज के विखंडन से ऊर्जा प्राप्त करने की प्रक्रिया श्वसन कहलाती है। ग्लूकोज (6-कार्बन) सबसे पहले कोशिकाद्रव्य में पाइरुवेट (3-कार्बन) में टूटता है। तत्पश्चात् पाइरुवेट का विखंडन तीन प्रकार से होता है:

  1. वायवीय श्वसन: ऑक्सीजन की उपस्थिति में माइटोकॉन्ड्रिया में होता है। पाइरुवेट → CO₂ + जल + अधिक ऊर्जा (38 ATP)।
  2. अवायवीय श्वसन: यीस्ट में ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है। पाइरुवेट → एथेनॉल + CO₂ + कम ऊर्जा (2 ATP)। इसे किण्वन (Fermentation) कहते हैं।
  3. पेशियों में ऑक्सीजन के अभाव में: भारी व्यायाम करने पर पाइरुवेट → लैक्टिक अम्ल + ऊर्जा। लैक्टिक अम्ल के जमा होने से पेशियों में ऐंठन (Cramps) होती है।

मानव श्वसन तंत्र

वायु का मार्ग नासाद्वार → ग्रसनी → कंठ → श्वासनली → श्वसनी → श्वसनिका → कूपिका (Alveoli) है। कूपिकाएँ फेफड़ों के अंदर गुब्बारे जैसी संरचनाएँ हैं जहाँ रक्त और वायु के बीच गैसों (O₂ तथा CO₂) का विनिमय होता है। हीमोग्लोबिन लाल रक्त कणों में उपस्थित श्वसन वर्णक है, जिसकी ऑक्सीजन के प्रति उच्च बंधुता होती है; यह फेफड़ों से ऑक्सीजन लेकर सभी कोशिकाओं तक पहुँचाता है।

4. वहन

मानव में वहन (परिसंचरण तंत्र)

रक्त, हृदय तथा रुधिर वाहिकाएँ मिलकर मानव का परिसंचरण तंत्र बनाती हैं। रक्त एक तरल संयोजी ऊतक है, जिसके तरल भाग को प्लाज्मा कहते हैं। रक्त में लाल रक्त कोशिकाएँ (RBC), श्वेत रक्त कोशिकाएँ (WBC) तथा प्लेटलेट्स होती हैं। मानव हृदय में चार कोष्ठ होते हैं - दो आलिंद तथा दो निलय। ऑक्सीजन प्रचुर रक्त फेफड़ों से बाएँ आलिंद में आकर बाएँ निलय से पूरे शरीर में पंप होता है; विऑक्सीजनित रक्त शरीर से दाएँ आलिंद में आकर दाएँ निलय द्वारा फेफड़ों में जाता है। इसे दोहरा परिसंचरण कहते हैं। धमनियाँ हृदय से ऑक्सीजनित रक्त को अंगों तक ले जाती हैं तथा इनकी भित्ति मोटी होती है; शिराएँ विऑक्सीजनित रक्त को हृदय तक लाती हैं और इनमें वाल्व होते हैं।

पादपों में वहन

पौधों में दो संवहन ऊतक होते हैं। जाइलम जड़ों से मिट्टी में अवशोषित जल तथा खनिजों को पत्तियों तक पहुँचाता है, और यह गति वाष्पोत्सर्जन कर्षण द्वारा नीचे से ऊपर की ओर होती है। फ्लोएम पत्तियों में बने भोजन (सुक्रोज) को पौधे के अन्य भागों तक पहुँचाता है, इस गति को स्थानांतरण (Translocation) कहते हैं, जिसमें ऊर्जा (ATP) का उपयोग होता है और गति दोनों दिशाओं में होती है।

5. उत्सर्जन

उपापचयी क्रियाओं के फलस्वरूप बने हानिकारक नाइट्रोजनयुक्त अपशिष्ट पदार्थों (जैसे यूरिया, यूरिक अम्ल) को शरीर से बाहर निकालने की प्रक्रिया उत्सर्जन कहलाती है।

मानव उत्सर्जन तंत्र

इसमें एक जोड़ा वृक्क, एक जोड़ा मूत्रवाहिनी, एक मूत्राशय तथा एक मूत्रमार्ग होता है। वृक्क की संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई वृक्काणु (Nephron) है; प्रत्येक वृक्क में लगभग 10 लाख वृक्काणु होते हैं। मूत्र निर्माण तीन चरणों में होता है:

  1. गुच्छीय निस्यंदन: बोमन संपुट में रक्त का छनना।
  2. चयनात्मक पुनरावशोषण: ग्लूकोज, अमीनो अम्ल, लवण तथा जल का रक्त में पुनः अवशोषण।
  3. नलिका स्रावण: शेष अपशिष्ट यूरिया के रूप में मूत्र बन जाते हैं।

जब दोनों वृक्क काम करना बंद कर देते हैं तो रक्त को मशीन द्वारा छानकर अपशिष्ट निकाला जाता है, इसे कृत्रिम वृक्क अथवा डायलिसिस कहते हैं।

पादपों में उत्सर्जन

पौधे अपने अपशिष्ट अनेक प्रकार से निकालते हैं - प्रकाश-संश्लेषण का अपशिष्ट O₂ रंध्रों द्वारा, अतिरिक्त जल वाष्पोत्सर्जन द्वारा, पुराने पत्तों एवं छाल के गिरने से, रेज़िन तथा गोंद के रूप में तथा कुछ अपशिष्ट मिट्टी में स्रावित करके।

त्वरित पुनरावृत्ति तालिकाएँ

तालिका 1: जैव प्रक्रम एवं उनके अंग

जैव प्रक्रम मानव में पादपों में
पोषण आहारनाल, आमाशय, क्षुद्रांत्र पत्ती, रंध्र
श्वसन फेफड़े, कूपिका रंध्र
वहन हृदय, धमनी, शिरा जाइलम, फ्लोएम
उत्सर्जन वृक्क, वृक्काणु रंध्र, रेज़िन, पत्तियाँ

तालिका 2: वायवीय एवं अवायवीय श्वसन की तुलना

लक्षण वायवीय श्वसन अवायवीय श्वसन
ऑक्सीजन आवश्यक अनावश्यक
स्थान माइटोकॉन्ड्रिया कोशिकाद्रव्य
उत्पाद CO₂ + जल एथेनॉल + CO₂
ऊर्जा 38 ATP 2 ATP
उदाहरण मानव यीस्ट

माइंड मैप

graph TD A["जैव प्रक्रम"] --> B["पोषण"] A --> C["श्वसन"] A --> D["वहन"] A --> E["उत्सर्जन"] B --> B1["स्वपोषी - प्रकाश संश्लेषण"] B --> B2["विषमपोषी - पाचन तंत्र"] C --> C1["वायवीय - 38 ATP"] C --> C2["अवायवीय - 2 ATP"] D --> D1["मानव - हृदय, धमनी, शिरा"] D --> D2["पादप - जाइलम, फ्लोएम"] E --> E1["मानव - वृक्क, वृक्काणु"] E --> E2["पादप - रंध्र, रेज़िन"]

महत्वपूर्ण आरेख (SVG)

आरेख 1: मानव पाचन तंत्र

मानव पाचन तंत्र मुँह (एमाइलेज) ग्रसिका आमाशय HCl, पेप्सिन क्षुद्रांत्र (पूर्ण पाचन, दीर्घरोम) यकृत (पित्त रस) अग्न्याशय बृहदांत्र (जल अवशोषण) दीर्घरोम अवशोषण का सतह क्षेत्र बढ़ाते हैं स्वर्ण नियम पाचन मुँह से प्रारंभ होकर बृहदांत्र में समाप्त होता है

आरेख 2: वायवीय एवं अवायवीय श्वसन

श्वसन के प्रकार ग्लूकोज (6-कार्बन) कोशिकाद्रव्य में पाइरुवेट (3-कार्बन) वायवीय श्वसन O₂ की उपस्थिति में CO₂ + जल + 38 ATP अवायवीय श्वसन O₂ की अनुपस्थिति में एथेनॉल + CO₂ + 2 ATP पेशियों में ऑक्सीजन अभाव → लैक्टिक अम्ल लैक्टिक अम्ल से पेशियों में ऐंठन यीस्ट में अवायवीय श्वसन को किण्वन कहते हैं Golden Rule वायवीय श्वसन में वायवीय से अधिक ऊर्जा मिलती है

सामान्य गलतियाँ

  1. छात्र प्रकाश-संश्लेषण को श्वसन समझ लेते हैं; प्रकाश-संश्लेषण में CO₂ ग्रहण तथा O₂ उत्सर्जित होती है, जबकि श्वसन में विपरीत होता है।
  2. वायवीय श्वसन में मिलने वाली ऊर्जा 2 ATP लिख दी जाती है; वास्तव में वायवीय में 38 ATP तथा अवायवीय में 2 ATP मिलती है।
  3. जाइलम और फ्लोएम का कार्य परस्पर बदल दिया जाता है; जाइलम जल का तथा फ्लोएम भोजन का वहन करता है।
  4. फुफ्फुस धमनी को ऑक्सीजनित रक्त ले जाने वाली बता दिया जाता है; वास्तव में फुफ्फुस धमनी विऑक्सीजनित रक्त फेफड़ों तक ले जाती है।
  5. पित्त रस को एंजाइम मान लिया जाता है; पित्त रस एंजाइम नहीं है, यह केवल वसा का इमल्सीकरण करता है।
  6. कूपिकाओं को गैस विनिमय के स्थान के स्थान पर श्वासनली समझ लिया जाता है; कूपिकाएँ फेफड़ों में होती हैं।
  7. यीस्ट में अवायवीय श्वसन का उत्पाद लैक्टिक अम्ल बता दिया जाता है; यीस्ट में एथेनॉल तथा CO₂ बनती है, लैक्टिक अम्ल पेशियों में बनता है।

परीक्षा युक्तियाँ

  1. प्रकाश-संश्लेषण की रासायनिक समीकरण लिखकर अभ्यास करें तथा उसमें क्लोरोफिल और सूर्य का प्रकाश का उल्लेख करें।
  2. मानव पाचन तंत्र का क्रम (मुँह → ग्रसिका → आमाशय → क्षुद्रांत्र → बृहदांत्र) याद रखें।
  3. आमाशय में स्रावित HCl, पेप्सिन, श्लेष्मा के कार्य अलग-अलग लिखें।
  4. वायवीय तथा अवायवीय श्वसन की तुलना तालिका रूप में लिखें (38 ATP बनाम 2 ATP)।
  5. दोहरा परिसंचरण की व्याख्या में बाएँ-दाएँ आलिंद तथा निलय के कार्य स्पष्ट करें।
  6. मूत्र निर्माण की तीन प्रक्रियाएँ (निस्यंदन, पुनरावशोषण, स्रावण) लिखें।
  7. पादपों के उत्सर्जन के कम से कम चार तरीके (O₂, वाष्पोत्सर्जन, रेज़िन, पत्तों का गिरना) लिखें।
  8. जाइलम एवं फ्लोएम में अंतर लिखते समय गति की दिशा का उल्लेख करें।

निष्कर्ष

जैव प्रक्रम वे आधारभूत प्रक्रियाएँ हैं जो जीवों के अनुरक्षण को सुनिश्चित करती हैं। पोषण, श्वसन, वहन तथा उत्सर्जन चार मुख्य जैव प्रक्रम हैं। पोषण में स्वपोषी (प्रकाश-संश्लेषण) तथा विषमपोषी (पाचन) दोनों प्रकार सम्मिलित हैं। श्वसन में ग्लूकोज के विखंडन से ऊर्जा प्राप्त होती है, जो वायवीय या अवायवीय हो सकती है। वहन मानव में रक्त, हृदय तथा वाहिकाओं द्वारा तथा पादपों में जाइलम और फ्लोएम द्वारा होता है। उत्सर्जन मानव में वृक्क तथा वृक्काणुओं द्वारा तथा पादपों में रंध्र, रेज़िन आदि द्वारा संपन्न होता है। इन प्रक्रमों की गहरी समझ जीव विज्ञान की आधारशिला है तथा स्वास्थ्य विज्ञान, कृषि एवं चिकित्सा में अत्यंत उपयोगी है।