विद्युत आधुनिक सभ्यता का आधार है। प्रकाश, गर्मी, परिवहन तथा संचार - सभी क्षेत्रों में विद्युत का उपयोग होता है। विद्युत का अध्ययन आवेश से प्रारंभ होता है। विद्युत आवेश पदार्थ का मूल गुण है, जो दो प्रकार का होता है - धनात्मक (प्रोटॉन पर) तथा ऋणात्मक (इलेक्ट्रॉन पर)। समान आवेश एक-दूसरे को प्रतिकर्षित करते हैं जबकि विपरीत आवेश आकर्षित करते हैं। आवेश का SI मात्रक कूलॉम (C) है तथा एक इलेक्ट्रॉन पर आवेश $-1.6 \times 10^{-19}$ C होता है। किसी चालक में आवेशों के बहने की दर को विद्युत धारा कहते हैं।
विद्युत धारा के प्रवाह के लिए विभवांतर की आवश्यकता होती है, जो सेल या बैटरी प्रदान करती है। विभवांतर तथा धारा के बीच संबंध ओम के नियम द्वारा दिया जाता है। इस अध्याय में हम विद्युत आवेश, विद्युत धारा, विभवांतर, ओम का नियम, प्रतिरोध तथा प्रतिरोधकता, प्रतिरोधकों का संयोजन (श्रेणीक्रम तथा पार्श्वक्रम), विद्युत धारा का तापीय प्रभाव, जूल का तापन नियम, विद्युत शक्ति तथा विद्युत ऊर्जा के व्यावसायिक मात्रक (kWh) का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
किसी चालक (जैसे ताँबे का तार) में विद्युत आवेश (इलेक्ट्रॉन) के बहने की दर को विद्युत धारा कहते हैं। यदि t समय में Q आवेश बहता है तो:
$I = \frac{Q}{t}$
विद्युत धारा का SI मात्रक ऐम्पियर (A) है। विद्युत धारा को परिपथ में ऐमीटर द्वारा मापा जाता है, जिसे सदैव श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है तथा जिसका प्रतिरोध अत्यंत कम होता है। विद्युत धारा की दिशा इलेक्ट्रॉनों के बहने की दिशा के विपरीत, अर्थात् धनात्मक टर्मिनल से ऋणात्मक टर्मिनल की ओर मानी जाती है।
एकांक आवेश को विद्युत परिपथ के एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने में किए गए कार्य को विभवांतर कहते हैं। यही विभवांतर इलेक्ट्रॉनों को गति प्रदान करता है।
$V = \frac{W}{Q}$
विभवांतर का SI मात्रक वोल्ट (V) है। इसे परिपथ में वोल्टमीटर द्वारा मापा जाता है, जिसे सदैव पार्श्वक्रम (समांतर) में जोड़ा जाता है तथा जिसका प्रतिरोध अत्यधिक होता है।
जर्मन भौतिकविद् जॉर्ज साइमन ओम (1827) के अनुसार, यदि भौतिक अवस्थाएँ (जैसे तापमान) समान रहें तो किसी चालक के सिरों के बीच विभवांतर (V) उसमें प्रवाहित विद्युत धारा (I) के समानुपाती होता है:
$V \propto I$
$V = I \times R$
यहाँ R चालक का प्रतिरोध है। V तथा I के बीच ग्राफ सदैव एक सीधी रेखा होती है।
प्रतिरोध: चालक का वह गुण जो विद्युत धारा के प्रवाह का विरोध करता है, प्रतिरोध कहलाता है। इसका SI मात्रक ओम (Ω) है। प्रतिरोध निम्न कारकों पर निर्भर करता है:
प्रतिरोधकता: किसी पदार्थ का प्रतिरोध उसकी लंबाई तथा क्षेत्रफल पर इस प्रकार निर्भर करता है:
$R = \rho \frac{l}{A}$
यहाँ ρ प्रतिरोधकता है, जिसका मात्रक ओम-मीटर (Ω·m) है। मिश्रधातुओं (जैसे नाइक्रोम) की प्रतिरोधकता शुद्ध धातुओं से अधिक होती है तथा वे उच्च तापमान पर नहीं पिघलतीं, इसलिए इनका उपयोग हीटर तथा प्रेस में होता है।
जब प्रतिरोधकों को एक सिरे से दूसरे सिरे तक जोड़ा जाता है तो उसे श्रेणीक्रम संयोजन कहते हैं। इसका कुल प्रतिरोध:
$R_s = R_1 + R_2 + R_3$
इस संयोजन में प्रत्येक प्रतिरोधक से समान धारा प्रवाहित होती है तथा विभवांतर विभिन्न प्रतिरोधकों में बँट जाता है ($V = V_1 + V_2 + V_3$)। इसका दोष है कि यदि एक उपकरण खराब हो जाए तो पूरा परिपथ टूट जाता है।
जब सभी प्रतिरोधकों के एक सिरे को एक बिंदु पर तथा दूसरे सिरे को दूसरे बिंदु पर जोड़ा जाता है तो उसे पार्श्वक्रम कहते हैं। इसका कुल प्रतिरोध:
$\frac{1}{R_p} = \frac{1}{R_1} + \frac{1}{R_2} + \frac{1}{R_3}$
इस संयोजन में प्रत्येक उपकरण के सिरों पर विभवांतर समान रहता है तथा धारा विभिन्न शाखाओं में बँट जाती है ($I = I_1 + I_2 + I_3$)। घरों की वायरिंग पार्श्वक्रम में की जाती है ताकि एक उपकरण खराब होने पर अन्य कार्य करते रहें। इस संयोजन में कुल प्रतिरोध सबसे छोटे प्रतिरोध से भी कम हो जाता है।
जब किसी उच्च प्रतिरोध वाले तार (जैसे नाइक्रोम) में विद्युत धारा प्रवाहित की जाती है तो इलेक्ट्रॉन तार के परमाणुओं से टकराकर अपनी गतिज ऊर्जा को ऊष्मा में बदल देते हैं, जिससे तार गर्म हो जाता है। जूल के तापन नियम के अनुसार उत्पन्न ऊष्मा धारा के वर्ग, प्रतिरोध तथा समय के समानुपाती होती है:
$H = I^2 \times R \times t$
इस ऊष्मा का मात्रक जूल है। तापीय प्रभाव के उपयोग हैं - विद्युत आयरन, टोस्टर, हीटर (नाइक्रोम तार), विद्युत बल्ब (टंगस्टन फिलामेंट, गलनांक लगभग 3380°C) तथा विद्युत फ्यूज। फ्यूज सुरक्षा उपकरण है जो शॉर्ट-सर्किट अथवा अधिभारण के समय पिघलकर परिपथ तोड़ देता है; यह सदैव श्रेणीक्रम में जोड़ा जाता है तथा सीसा और टिन की मिश्रधातु से बना होता है।
विद्युत ऊर्जा के खर्च होने की दर को विद्युत शक्ति कहते हैं। इसके सूत्र हैं:
$P = V \times I$ $P = I^2 \times R$ $P = \frac{V^2}{R}$
विद्युत शक्ति का SI मात्रक वाट (W) है। विद्युत ऊर्जा का व्यावसायिक मात्रक किलोवाट-घंटा (kWh) है, जिसे विद्युत बिल में यूनिट कहते हैं।
$1 \text{ kWh} = 3.6 \times 10^6 \text{ J}$
जब 1000 वाट का उपकरण 1 घंटे तक चलता है तो 1 यूनिट विद्युत व्यय होती है।
| राशि | सूत्र | SI मात्रक | मापक यंत्र |
|---|---|---|---|
| विद्युत धारा | $I = Q/t$ | ऐम्पियर | ऐमीटर |
| विभवांतर | $V = W/Q$ | वोल्ट | वोल्टमीटर |
| प्रतिरोध | $R = V/I$ | ओम | ओममीटर |
| शक्ति | $P = VI$ | वाट | वाटमीटर |
| लक्षण | श्रेणीक्रम | पार्श्वक्रम |
|---|---|---|
| कुल प्रतिरोध | $R_1+R_2+R_3$ | $1/R_p = 1/R_1+1/R_2$ |
| धारा | समान | बँट जाती है |
| विभवांतर | बँट जाता है | समान |
| उपयोग | झालर | घरेलू वायरिंग |
विद्युत आधुनिक जीवन का आधार है। विद्युत आवेश का प्रवाह ही विद्युत धारा है, जिसका मात्रक ऐम्पियर है। विभवांतर आवेश को गति देता है तथा इसका मात्रक वोल्ट है। ओम का नियम V = IR विभवांतर, धारा तथा प्रतिरोध में संबंध स्थापित करता है। प्रतिरोध लंबाई, क्षेत्रफल, पदार्थ की प्रकृति तथा तापमान पर निर्भर करता है। श्रेणीक्रम में प्रतिरोध जुड़ते हैं जबकि पार्श्वक्रम में व्युत्क्रम जुड़ते हैं; घरेलू वायरिंग पार्श्वक्रम में होती है। जूल के तापन नियम के अनुसार विद्युत धारा का तापीय प्रभाव H = I²Rt है, जिसका उपयोग हीटर, बल्ब तथा फ्यूज में होता है। विद्युत शक्ति P = VI है तथा विद्युत बिल 1 kWh (यूनिट) में आता है। विद्युत का ज्ञान दैनिक जीवन, उद्योग तथा तकनीकी विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है।