मानव नेत्र एक अत्यंत मूल्यवान तथा संवेदनशील ज्ञानेंद्रिय है, जो हमें इस अद्भुत रंगबिरंगे संसार को देखने योग्य बनाती है। मानव नेत्र एक कैमरे की भाँति कार्य करता है, जिसमें कॉर्निया तथा नेत्र लेंस प्रकाश को रेटिना पर केंद्रित करते हैं। नेत्र का संवेदनशील पर्दा रेटिना है, जहाँ वस्तु का वास्तविक तथा उल्टा प्रतिबिंब बनता है। रेटिना की कोशिकाएँ इस प्रतिबिंब को विद्युत संकेतों में बदलती हैं, जिन्हें दृक् तंत्रिका मस्तिष्क तक पहुँचाती है तथा मस्तिष्क हमें वस्तु सीधी दिखाता है। नेत्र की समंजन क्षमता के कारण ही हम पास तथा दूर दोनों की वस्तुएँ स्पष्ट देख पाते हैं।
इस अध्याय में हम मानव नेत्र की संरचना तथा भागों के कार्य, समंजन क्षमता, दृष्टि दोष (निकट दृष्टि दोष, दीर्घ दृष्टि दोष, जरा-दूरदृष्टिता) तथा उनके संशोधन, प्रिज्म से प्रकाश का अपवर्तन, श्वेत प्रकाश का विक्षेपण (VIBGYOR), इंद्रधनुष का निर्माण, वायुमंडलीय अपवर्तन (तारों का टिमटिमाना, अग्रिम सूर्योदय) तथा प्रकाश का प्रकीर्णन (आकाश का नीला होना, सूर्योदय-सूर्यास्त पर सूर्य का लाल होना) का विस्तार से अध्ययन करेंगे।
नेत्र लेंस की वह क्षमता जिसके कारण वह अपनी फोकस दूरी समायोजित करके पास तथा दूर दोनों की वस्तुएँ स्पष्ट दिखा पाता है, समंजन क्षमता कहलाती है। दूर की वस्तुएँ देखते समय पक्ष्माभी पेशियाँ शिथिल होती हैं, लेंस पतला होता है तथा फोकस दूरी बढ़ जाती है। पास की वस्तुएँ देखते समय पक्ष्माभी पेशियाँ सिकुड़ती हैं, लेंस मोटा होता है तथा फोकस दूरी घट जाती है। सामान्य आँख का निकट बिंदु (स्पष्ट दृष्टि की न्यूनतम दूरी) 25 सेमी होती है तथा दूर बिंदु अनंत होता है।
इस दोष में व्यक्ति पास की वस्तुएँ स्पष्ट देखता है परंतु दूर की वस्तुएँ धुंधली दिखती हैं। इसके कारण हैं - नेत्र लेंस की वक्रता का बढ़ जाना या नेत्र गोलक का लंबा हो जाना। प्रतिबिंब रेटिना के सामने बनता है। इसका संशोधन अवतल लेंस के चश्मे द्वारा होता है, जो प्रकाश को फैलाकर प्रतिबिंब को रेटिना पर केंद्रित करता है।
इस दोष में व्यक्ति दूर की वस्तुएँ स्पष्ट देखता है परंतु पास की वस्तुएँ (25 सेमी) धुंधली दिखती हैं। इसके कारण हैं - नेत्र लेंस की फोकस दूरी का अत्यधिक बढ़ जाना या नेत्र गोलक का छोटा हो जाना। प्रतिबिंब रेटिना के पीछे बनता है। इसका संशोधन उत्तल लेंस के चश्मे द्वारा होता है।
वृद्धावस्था में पक्ष्माभी पेशियों के कमजोर होने तथा लेंस के लचीलेपन में कमी के कारण समंजन क्षमता घट जाती है तथा पास की वस्तुएँ स्पष्ट नहीं दिखतीं। इसका संशोधन द्विफोकसी लेंस द्वारा होता है, जिसके ऊपरी भाग में दूर देखने के लिए तथा निचले भाग में पढ़ने के लिए उत्तल लेंस होता है। मोतियाबिंद (Cataract) में नेत्र लेंस धुंधला हो जाता है, जिसका उपचार शल्य चिकित्सा से होता है।
प्रिज्म एक पारदर्शी माध्यम है जिसके दो त्रिभुजाकार आधार तथा तीन आयताकार पार्श्व पृष्ठ होते हैं। जब प्रकाश किरण प्रिज्म से गुजरती है तो वह आधार की ओर मुड़ जाती है; आपतित तथा निर्गत किरणों के बीच के कोण को विचलन कोण कहते हैं।
सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों का मिश्रण है। जब श्वेत प्रकाश काँच के प्रिज्म से गुजरता है तो वह सात अवयवी रंगों में बँट जाता है। इस घटना को विक्षेपण कहते हैं तथा प्राप्त रंगों की पट्टी को स्पेक्ट्रम कहते हैं। रंगों का क्रम VIBGYOR है - बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल। लाल रंग सबसे कम तथा बैंगनी सबसे अधिक मुड़ता है, क्योंकि लाल का तरंगदैर्ध्य सबसे अधिक होता है।
इंद्रधनुष बारिश के बाद सूर्य की विपरीत दिशा में बनता है। हवा में लटकी जल की सूक्ष्म बूँदें छोटे प्रिज्मों की भाँति कार्य करती हैं। सूर्य का प्रकाश बूँदों में प्रवेश करते समय अपवर्तित एवं विक्षेपित होता है, बूँद के अंदर पूर्ण आंतरिक परावर्तन होता है तथा बाहर निकलते समय पुनः अपवर्तन होता है।
वायुमंडल अलग-अलग घनत्व वाली वायु की परतों से बना है, जिससे प्रकाश का निरंतर अपवर्तन होता रहता है। इसी कारण तारे टिमटिमाते दिखते हैं, क्योंकि वायुमंडलीय अपवर्तन से तारे की आभासी स्थिति बदलती रहती है। ग्रह पृथ्वी के पास होने के कारण विस्तृत स्रोत माने जाते हैं, अतः वे टिमटिमाते नहीं दिखते। वायुमंडलीय अपवर्तन के कारण सूर्य क्षितिज से नीचे होने पर भी अग्रिम सूर्योदय (लगभग 2 मिनट पहले) तथा विलंबित सूर्यास्त (2 मिनट बाद तक) दिखता है।
जब प्रकाश माध्यम के सूक्ष्म कणों (वायु के अणु, धूल, धुआँ) से टकराकर सभी दिशाओं में फैल जाता है तो इसे प्रकाश का प्रकीर्णन कहते हैं। छोटे कण छोटे तरंगदैर्ध्य (नीले) प्रकाश का अधिक प्रकीर्णन करते हैं। इसीलिए आकाश नीला दिखता है तथा टिंडल प्रभाव में कोलाइडी कणों द्वारा प्रकाश का मार्ग दिखाई देता है। खतरे का संकेत लाल रखा जाता है क्योंकि लाल रंग का प्रकीर्णन सबसे कम होता है। सूर्योदय तथा सूर्यास्त के समय सूर्य लाल दिखता है क्योंकि उस समय प्रकाश को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है तथा नीला प्रकाश प्रकीर्णित होकर बिखर जाता है।
| दोष | लक्षण | कारण | प्रतिबिंब स्थान | संशोधन |
|---|---|---|---|---|
| निकट दृष्टि दोष | दूर की वस्तुएँ धुंधली | लेंस वक्रता अधिक | रेटिना के सामने | अवतल लेंस |
| दीर्घ दृष्टि दोष | पास की वस्तुएँ धुंधली | लेंस वक्रता कम | रेटिना के पीछे | उत्तल लेंस |
| जरा-दूरदृष्टिता | समंजन क्षमता कम | वृद्धावस्था | - | द्विफोकसी लेंस |
| घटना | कारण |
|---|---|
| तारों का टिमटिमाना | वायुमंडलीय अपवर्तन |
| अग्रिम सूर्योदय | वायुमंडलीय अपवर्तन |
| आकाश का नीला होना | प्रकाश का प्रकीर्णन |
| सूर्योदय-सूर्यास्त पर लाल सूर्य | प्रकाश का प्रकीर्णन |
मानव नेत्र एक अत्यंत संवेदनशील प्रकाशिक अंग है, जो कैमरे की भाँति कार्य करता है। कॉर्निया, पुतली, नेत्र लेंस तथा रेटिना प्रतिबिंब निर्माण में सहयोग करते हैं। समंजन क्षमता के कारण हम पास तथा दूर की वस्तुएँ स्पष्ट देख पाते हैं। निकट दृष्टि दोष में अवतल लेंस, दीर्घ दृष्टि दोष में उत्तल लेंस तथा जरा-दूरदृष्टिता में द्विफोकसी लेंस प्रयुक्त होते हैं। श्वेत प्रकाश प्रिज्म से गुजरने पर सात रंगों में विक्षेपित होता है, जिससे स्पेक्ट्रम बनता है तथा इंद्रधनुष का निर्माण होता है। वायुमंडलीय अपवर्तन तथा प्रकाश के प्रकीर्णन से तारों का टिमटिमाना, अग्रिम सूर्योदय, आकाश का नीला होना तथा सूर्योदय-सूर्यास्त पर सूर्य का लाल दिखना जैसी घटनाएँ समझाई जाती हैं। नेत्र की देखभाल तथा दृष्टि दोषों के बारे में जागरूकता हमारे जीवन की गुणवत्ता के लिए आवश्यक है।