भारत में राष्ट्रवाद का विकास 19वीं शताब्दी के अंत में शुरू हुआ और 20वीं शताब्दी के मध्य तक पूर्ण रूप ले चुका था। भारत में राष्ट्रवाद ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरोध के रूप में उभरा। भारतीयों में अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता बढ़ी और उन्होंने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष शुरू किया। इस अध्याय में हम भारतीय राष्ट्रवाद के उदय के कारणों, प्रमुख आंदोलनों और स्वतंत्रता संग्राम के महत्वपूर्ण चरणों को समझेंगे।
भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में कई कारकों ने योगदान दिया। ब्रिटिश शिक्षा के प्रसार ने भारतीयों में उदारवादी विचारों को जन्म दिया। रेलवे, डाक और टेलीग्राफ ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ा। प्रेस और अखबारों ने राष्ट्रवादी विचारों का प्रसार किया। आर्थिक शोषण और राजनीतिक दमन ने भारतीयों में असंतोष पैदा किया। इन सभी कारणों से भारत में राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।
प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारतीय राष्ट्रवाद को नई दिशा दी। ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों से युद्ध में भाग लेने के लिए आह्वान किया, और भारतीयों ने बड़ी संख्या में ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर युद्ध लड़ा। युद्ध के बाद भारतीयों को उम्मीद थी कि ब्रिटिश सरकार उन्हें अधिक स्वशासन देगी। परंतु युद्ध के बाद सरकार ने इन उम्मीदों को पूरा नहीं किया, जिससे भारतीयों में निराशा और असंतोष बढ़ा।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत में राष्ट्रीय आंदोलन तेज हुआ। युद्ध के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर बोझ पड़ा, महंगाई बढ़ी और लोगों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा, रॉलेट एक्ट जैसे दमनकारी कानूनों ने भारतीयों के अधिकारों को छीनने का प्रयास किया। इन परिस्थितियों में महात्मा गांधी ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नया नेतृत्व और दिशा प्रदान की।
महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे। उन्होंने सत्याग्रह के सिद्धांत के माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद को एक नई दिशा दी। सत्याग्रह का अर्थ है अहिंसक विरोध। गांधीजी ने चंपारण (बिहार) में नील उत्पादक किसानों के लिए, खेड़ा (गुजरात) में किसानों के कर माफी के लिए सत्याग्रह किया। इन सत्याग्रहों ने सिद्ध किया कि अहिंसक विरोध भी प्रभावी हो सकता है।
1920 में गांधीजी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। असहयोग आंदोलन का उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को सहयोग न करना था। लोगों ने सरकारी स्कूल, कॉलेज, अदालत और सरकारी नौकरियों का बहिष्कार किया। विदेशी कपड़ों का बहिष्कार करके खादी का उपयोग बढ़ाया गया। 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने आंदोलन को वापस ले लिया। असहयोग आंदोलन ने भारतीयों में राष्ट्रीय जागरूकता फैलाई।
1930 में गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। इस आंदोलन की शुरुआत दांडी मार्च से हुई, जिसमें गांधीजी ने अपने साथियों के साथ 240 मील की यात्रा करके समुद्र तट पर नमक बनाया। नमक कानून को तोड़ने का यह कार्य ब्रिटिश सरकार के खिलाफ प्रतीकात्मक विरोध था। सविनय अवज्ञा आंदोलन में लाखों लोगों ने भाग लिया, जिनमें महिलाएँ भी शामिल थीं।
सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान लोगों ने करों का भुगतान करने से इनकार किया, सरकारी दुकानों और अदालतों का बहिष्कार किया। गांधीजी सहित हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। 1931 में गांधी-इरविन समझौते के बाद आंदोलन अस्थायी रूप से स्थगित हुआ। इसके बाद 1932 में पूना समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की माँग वापस ली गई। सविनय अवज्ञा आंदोलन ने राष्ट्रवाद को जन आंदोलन में बदल दिया।
1942 में महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement) शुरू किया। यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के पूर्ण अंत के लिए था। गांधीजी ने 'करो या मरो' (Do or Die) का नारा दिया। भारत छोड़ो आंदोलन में देशभर के लोगों ने भाग लिया, और सरकार ने इस आंदोलन को दबाने के लिए कठोर कदम उठाए। गांधीजी सहित सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया, परंतु आंदोलन जारी रहा।
भारत छोड़ो आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय ब्रिटिश शासन को बर्दाश्त करने के लिए तैयार नहीं हैं। इस आंदोलन ने स्वतंत्रता के लिए भारतीयों के संकल्प को और मजबूत किया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन कमजोर हो रहा था, और भारतीय राष्ट्रवाद पूरी ताकत से उभर चुका था। अंततः 15 अगस्त 1947 को भारत को स्वतंत्रता मिली। भारत छोड़ो आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम महत्वपूर्ण चरण था।
भारतीय राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक जागरण भी था। रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय और बाल गंगाधर तिलक जैसे लेखकों और विचारकों ने राष्ट्रवादी भावनाओं को साहित्य और गीतों के माध्यम से फैलाया। 'वंदे मातरम' और 'सारे जहाँ से अच्छा' जैसे गीत राष्ट्रवाद के प्रतीक बने। इन सांस्कृतिक प्रतीकों ने भारतीयों में देशभक्ति की भावना जगाई।
राष्ट्रवाद के साथ-साथ भारत में सामाजिक सुधार आंदोलन भी चले। राजा राम मोहन राय, स्वामी विवेकानंद और डॉ. भीमराव अंबेडकर जैसे विचारकों ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ आवाज़ उठाई। भारतीय राष्ट्रवाद ने विभिन्न भाषाओं, धर्मों और क्षेत्रों के लोगों को एक सूत्र में बाँधा। इसी राष्ट्रवाद की शक्ति से भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की और एक स्वतंत्र गणराज्य के रूप में उभरा।
| आंदोलन | वर्ष | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| असहयोग आंदोलन | 1920 | सरकारी संस्थाओं का बहिष्कार |
| सविनय अवज्ञा | 1930 | नमक कानून तोड़ना |
| भारत छोड़ो | 1942 | करो या मरो |
| स्थान | मुद्दा |
|---|---|
| चंपारण | नील किसान |
| खेड़ा | कर माफी |
| दांडी | नमक कानून |
भारत में राष्ट्रवाद का विकास ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरोध के रूप में हुआ। प्रथम विश्व युद्ध के बाद निराशा और असंतोष ने राष्ट्रीय आंदोलन को तेज किया। महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो जैसे आंदोलनों ने स्वतंत्रता संग्राम को जन आंदोलन में बदल दिया। सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों ने भारतीय राष्ट्रवाद को विशिष्ट पहचान दी। साहित्य, गीत और सांस्कृतिक चेतना ने राष्ट्रवादी भावनाओं को और मजबूत किया। इन्हीं प्रयासों के फलस्वरूप 1947 में भारत को स्वतंत्रता मिली और वह एक स्वतंत्र गणराज्य के रूप में उभरा।