विस्तृत सिद्धांत, सूत्र, आरेख और स्मृति सहायक।
'माता का आँचल' पाठ प्रसिद्ध साहित्यकार शिवपूजन सहाय द्वारा रचित उनके प्रसिद्ध उपन्यास 'देहाती दुनिया' का एक महत्वपूर्ण अंश है। यह सन 1926 में प्रकाशित हुआ था और इसे हिंदी साहित्य का पहला आंचलिक उपन्यास माना जाता है। इस पाठ में 1930 के दशक की ग्रामीण संस्कृति, बाल-मनोविज्ञान, बच्चों के खेल और पिता-माता के वात्सल्य का सजीव एवं आत्मीय चित्रण किया गया है।
| पात्र का नाम | वास्तविक/उपनाम | मुख्य विशेषताएँ |
|---|---|---|
| तारकेश्वर नाथ | भोलानाथ (उपनाम) | कथा के मुख्य पात्र (बालक), चंचल, पिता से अत्यधिक लगाव, ग्रामीण खेलों में रुचि। |
| पिता जी | - | धार्मिक प्रवृत्ति, स्नेही, पुत्र से अगाध प्रेम, बच्चों के खेलों में भाग लेने वाले। |
| माता जी | - | ममतामयी, वात्सल्य से पूर्ण, संकट के समय बच्चे का सबसे सुरक्षित आश्रय। |
| मित्र मंडली | बैजू आदि | भोलानाथ के संगी-साथी, खेलकूद व शरारत में सहभागी। |
| मूसन तिवारी | - | गाँव के वृद्ध व्यक्ति, जिन्हें बच्चों ने चिढ़ाया था। |
भोलानाथ अपने साथियों के साथ अनेक प्रकार के ग्रामीण खेल खेलता था: * दुकानदारी का खेल: कंकड़ों की मिठाई, पत्तों की पूरी-कचौड़ी और मिट्टी के दीयों के थाल बनाकर दुकान सजाई जाती थी। * घरोंदा बनाना: धूल की मेढ़ की दीवारें और तिनकों का छप्पर बनाकर घर बनाया जाता था। * दावत और पंगत: भोजन का आयोजन होता था जिसमें बच्चे ही पंगत में बैठते थे और पिता जी भी अंत में आकर बैठ जाते थे, जिससे बच्चे हँसकर भाग जाते थे। * बारात का जुलूस: टूटे हुए चूहेदानी की पालकी, आम के उगे हुए पौधों की शहनाई और समधी बनने का नाटक किया जाता था। * खेती का खेल: कंकड़ को बीज और हल-बैल बनाकर फसल उगाने और काटने का अभिनय किया जाता था।
एक दिन रास्ते में बच्चों को मूसन तिवारी मिले। बैजू नाम के शरारती लड़के ने उन्हें चिढ़ाते हुए कहा - "बूढ़ा बरदौहाँ बेधड़क माँगे करेले का चोखा"। मूसन तिवारी ने बच्चों को खदेड़ा और पाठशाला में गुरुजी से शिकायत कर दी। गुरुजी ने भोलानाथ को पकड़वाकर मंगवाया और उसकी पिटाई की। बाद में पिता जी आकर गुरुजी से विनती करके भोलानाथ को दुलारते हुए घर वापस लाए।
इस पाठ का मूल संदेश यह है कि बच्चे का अपने पिता से चाहे कितना भी गहरा लगाव क्यों न हो, लेकिन अत्यंत संकट या भय की स्थिति में उसे जो परम सुरक्षा, आत्मीयता और शांति अपनी माता के आँचल में मिलती है, वह कहीं और नहीं मिल सकती। माता का आँचल वात्सल्य, सुरक्षा और ममता का सबसे बड़ा प्रतीक है।
graph TD
A["भोलानाथ की दिनचर्या: पिता के साथ पूजा व दुलार"] --> B["ग्रामीण खेल: दुकान, बारात, खेती व दावत"]
B --> C["मूसन तिवारी को चिढ़ाना व गुरुजी की सजा"]
C --> D["टीले पर चूहों के बिल में पानी डालना"]
D --> E["बिल से भयानक साँप का निकलना"]
E --> F["भयभीत होकर भोलानाथ का घर की ओर भागना"]
F --> G["पिता को लांघकर माँ की गोद में शरण लेना"]
G --> H["माता के आँचल में सुरक्षा व आत्मिक शांति की प्राप्ति"]
शिवपूजन सहाय के उपन्यास 'देहाती दुनिया' से लिए गए इस अंश में बालक भोलानाथ के जीवन में माता और पिता की भिन्न-भिन्न भूमिकाओं का अत्यंत मर्मस्पर्शी चित्रण है:
| तुलना का आधार | बाबूजी (पिता) का सानिध्य एवं स्नेह | मैया (माता) का ममतामयी आँचल |
|---|---|---|
| दैनिक दिनचर्या | सुबह नहलाना, पूजा में साथ बिठाना, भभूत का तिलक लगाना | सिर में कड़वा (सरसों का) तेल लगाना, चोटी गूंथना, काजल का टीका लगाना |
| खान-पान की शैली | कटोरे में दूध-भात सानकर प्यार से थोड़ा-थोड़ा खिलाना | यह कहकर कि "मर्द क्या जानें बच्चों को कैसे खिलाना चाहिए", बड़े-बड़े कौर बनाकर भरपेट खिलाना |
| खेल-कूद एवं मनोरंजन | बच्चों के कुश्ती, बारात, मिठाई की दुकान और खेती के खेलों में बच्चा बनकर शामिल होना | बच्चों के खेल देखकर दूर से मुस्कुराना और नजर उतारना |
| संकट एवं भय के क्षण | सांप को देखकर भागते बालक को पिता पुकारते रहे, पर बालक उनके पास नहीं रुका | बिलखता हुआ बालक सीधे माँ की गोद में छिपा और माँ के आँचल में ही उसे परम सुरक्षा मिली |
प्रश्न 1 (3 अंक): "भोलानाथ अपने पिता से अत्यधिक जुड़ाव होने के बावजूद विपत्ति के समय पिता के पास न जाकर माँ की शरण में ही क्यों गया?" उत्तर: भोलानाथ का अधिकांश दिन पिता के साथ बीतता था—नहाना, खाना और खेलना सब पिता के साथ होता था। परंतु जब उसने टीले पर चूहों के बिल में पानी डालने पर फुंकारता हुआ भयंकर काला साँप देखा, तो वह प्राण बचाने के लिए बेतहाशा भागा। उस घोर भय और संकट की घड़ी में उसे पिता के लाड़-प्यार से ज्यादा माँ की गोद और उसके आँचल की ममतामयी सुरक्षा पर भरोसा था। माँ का आँचल बच्चे के लिए प्रेम, सांत्वना और भयमुक्ति का सबसे सुरक्षित दुर्ग होता है।
प्रश्न 2 (3 अंक): "पाठ में आए बच्चों के खेलों की तुलना वर्तमान समय के बच्चों के खेलों से कीजिए।" उत्तर: पाठ में वर्णित खेल पूरी तरह प्रकृति और गाँव की सहज वस्तुओं से जुड़े थे। बच्चे धूल, मिट्टी, पत्तों, घड़ों के ठीकरों और लकड़ी के टुकड़ों से घरौंदा, मिठाई की दुकान और खेती के खेल खेलते थे, जिसमें शारीरिक व्यायाम और आपसी मेलजोल भरपूर था। इसके विपरीत, आज के बच्चे फ्लैट संस्कृति में बंद होकर स्मार्टफोन, वीडियो गेम, टैबलेट और टेलीविजन पर आभासी खेल खेलते हैं। इससे उनका शारीरिक विकास और सामाजिक संवाद कुंठित हो रहा है।